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CGWA Report 2025: देश के भूजल में बढ़ रहा धीमा जहर, दिल्ली में नाइट्रेट और पंजाब में यूरेनियम प्रदूषण सबसे गंभीर

देश के भूजल में रासायनिक प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में यह गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA) की प्री-मानसून नेशनल ग्राउंड वाटर क्वालिटी बुलेटिन-2025 रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देशभर से लिए गए हर पांच में से एक भूजल नमूने में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित सीमा से अधिक पाई गई।
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देश के भूजल में रासायनिक प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में यह गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA) की प्री-मानसून नेशनल ग्राउंड वाटर क्वालिटी बुलेटिन-2025 रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देशभर से लिए गए हर पांच में से एक भूजल नमूने में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित सीमा से अधिक पाई गई। यह रिपोर्ट राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के निर्देश पर तैयार कर प्रस्तुत की गई है। वैज्ञानिकों ने देशभर के 23,610 मॉनिटरिंग स्टेशनों से लिए गए पानी के नमूनों का विश्लेषण कर बताया कि अधिकांश भूजल अभी भी पीने योग्य है, लेकिन कई राज्यों में नाइट्रेट, यूरेनियम, फ्लोराइड, आयरन और आर्सेनिक जैसे खतरनाक रसायनों का स्तर लगातार बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र (43.33%), राजस्थान (41.73%), कर्नाटक (36.49%), दिल्ली (34.62%) और आंध्र प्रदेश (31.29%) नाइट्रेट प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, तमिलनाडु और तेलंगाना में भी स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है।


रिपोर्ट में सबसे गंभीर चेतावनी पंजाब को लेकर दी गई है, जहां 31.53 प्रतिशत भूजल नमूनों में यूरेनियम प्रदूषण दर्ज किया गया। इसके बाद हरियाणा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, दिल्ली, बिहार और राजस्थान प्रभावित राज्यों में शामिल हैं। वहीं आर्सेनिक प्रदूषण सबसे अधिक असम और पश्चिम बंगाल में पाया गया, जबकि बिहार, पंजाब और उत्तर प्रदेश भी इससे प्रभावित हैं। आयरन प्रदूषण त्रिपुरा और असम में सबसे अधिक दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार नाइट्रेट युक्त पानी बच्चों में ब्लू बेबी सिंड्रोम और शरीर में ऑक्सीजन की कमी का कारण बन सकता है। फ्लोराइड दांतों और हड्डियों को नुकसान पहुंचाता है, यूरेनियम किडनी की गंभीर बीमारियों और कैंसर का खतरा बढ़ाता है, जबकि आर्सेनिक त्वचा रोग और कैंसर जैसी घातक बीमारियों से जुड़ा है। अधिक आयरन वाले पानी से स्वाद खराब होने, पाइपलाइन जाम होने, बर्तनों पर लाल-भूरे दाग पड़ने और आयरन बैक्टीरिया बढ़ने जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं। इसके अलावा अधिक खारापन हृदय संबंधी परेशानियों और थकान का कारण बन सकता है।


CGWA ने रिपोर्ट में इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को मिट्टी की जांच के आधार पर ही उर्वरकों का संतुलित उपयोग करना चाहिए और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम कर जैविक खेती को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे नाइट्रेट प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके। इसके साथ ही वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) और कृत्रिम भूजल रिचार्ज को बड़े स्तर पर लागू करने की आवश्यकता बताई गई है, ताकि भूजल में रसायनों की सांद्रता कम हो सके। रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि मौजूदा मॉनिटरिंग नेटवर्क के कम से कम 25 प्रतिशत स्टेशनों को दीर्घकालिक ट्रेंड मॉनिटरिंग स्टेशन बनाया जाए, जिससे भूजल की गुणवत्ता में होने वाले बदलावों पर लगातार नजर रखी जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में देश के कई हिस्सों में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता और लोगों का स्वास्थ्य दोनों गंभीर संकट का सामना कर सकते हैं।

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