Supreme Court: डिजिटल डेटा कानून को चुनौती, 21 न्यूज पब्लिशर्स ने क्यों उठाए पत्रकारिता की आजादी पर सवाल?
- sakshi choudhary
- 27 Oct, 2026
देश के 21 प्रमुख डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स के संगठन डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act), 2023 के प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। संगठन का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी पत्रकारिता, भ्रष्टाचार से जुड़े खुलासों और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब इंटरनेट पर लोगों की निजी जानकारी सुरक्षित रखने और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया जा रहा है। दूसरी ओर, मीडिया संगठनों का तर्क है कि सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की जांच करते समय पत्रकारों के लिए कुछ विशेष सुरक्षा उपाय भी जरूरी हैं। मामले पर सुप्रीम कोर्ट में 27 अक्टूबर 2026 को सुनवाई निर्धारित है।
क्या है डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम का उद्देश्य लोगों की डिजिटल निजी जानकारी की सुरक्षा करना और यह तय करना है कि कंपनियां व अन्य संस्थाएं इस डेटा का इस्तेमाल किन शर्तों पर कर सकती हैं। इसमें लोगों की सहमति, उनकी जानकारी के इस्तेमाल और डेटा से जुड़े अधिकारों जैसे विषय शामिल हैं।
इस कानून के कई अहम प्रावधान चरणबद्ध तरीके से लागू होने हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सहमति और डेटा इस्तेमाल से जुड़े कई प्रमुख प्रावधान 13 मई 2027 से लागू होने निर्धारित हैं।
लेकिन DNPA का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से मीडिया संस्थानों के सामने व्यावहारिक मुश्किलें आ सकती हैं। संगठन ने यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे क्षेत्रों के डेटा संरक्षण कानूनों का हवाला देते हुए कहा है कि भारत में भी पत्रकारिता और सार्वजनिक हित की रिपोर्टिंग के लिए स्पष्ट सुरक्षा उपाय होने चाहिए।
खोजी पत्रकारिता और गोपनीय सूत्रों को लेकर क्या चिंता है?
DNPA की प्रमुख चिंता यह है कि अगर पत्रकारों को किसी व्यक्ति की निजी जानकारी इस्तेमाल करने से पहले उसकी सहमति लेनी पड़ी, तो भ्रष्टाचार या किसी बड़े घोटाले की जांच प्रभावित हो सकती है।
उदाहरण के तौर पर, मान लीजिए कोई पत्रकार किसी सरकारी अधिकारी या कारोबारी से जुड़े कथित भ्रष्टाचार की जांच कर रहा है। रिपोर्ट तैयार करने के लिए उसे दस्तावेजों, लेन-देन या दूसरी व्यक्तिगत जानकारी की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में जिस व्यक्ति के खिलाफ जांच चल रही है, उससे पहले ही सहमति मांगना रिपोर्टिंग को मुश्किल बना सकता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे सबूत मिटाए जाने या गवाहों पर दबाव पड़ने का जोखिम भी हो सकता है।
मीडिया संगठन को यह आशंका भी है कि कानून के तहत सरकार को संस्थाओं से जानकारी मांगने की जो शक्तियां दी गई हैं, उनका इस्तेमाल पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान जानने के लिए किया जा सकता है। अगर किसी व्हिसलब्लोअर को लगे कि उसकी पहचान उजागर हो सकती है, तो वह भ्रष्टाचार या अनियमितताओं से जुड़ी जानकारी साझा करने से पीछे हट सकता है।
हालांकि, ये याचिकाकर्ताओं की आशंकाएं और कानूनी दलीलें हैं। इनका वास्तविक प्रभाव और कानून की व्याख्या अदालत के विचार के विषय हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट से क्या उम्मीद है?
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि लोगों की डिजिटल निजता की रक्षा करने वाले कानून और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। एक तरफ नागरिकों की निजी जानकारी का गलत इस्तेमाल रोकना जरूरी है, तो दूसरी तरफ सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की स्वतंत्र जांच और रिपोर्टिंग भी महत्वपूर्ण है।
अदालत यह देख सकती है कि चुनौती दिए गए प्रावधानों का पत्रकारिता पर क्या असर पड़ सकता है और क्या मौजूदा कानूनी व्यवस्था में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। DNPA ने कानून के संबंधित प्रावधानों को चुनौती देते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की है। सुनवाई के परिणाम और अदालत के निर्देशों की पुष्टि आधिकारिक आदेश से ही की जानी चाहिए।
डिजिटल डेटा संरक्षण कानून का उद्देश्य लोगों की निजी जानकारी को सुरक्षित रखना है, जबकि DNPA की याचिका का केंद्र यह चिंता है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट न होने से खोजी रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है। अब इस मामले में अहम बात यह होगी कि अदालत निजता के अधिकार, सार्वजनिक हित और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच कानूनी संतुलन को किस तरह देखती है।