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फोर्टिस हॉस्पिटल नोएडा ने किडनी स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए सपोर्ट ग्रुप मीट ‘ संकल्प – सेलिब्रेशन ऑफ लाइफ’ का आयोजन किया।

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नोएडा। अशोक तोंगड़

फोर्टिस हॉस्पिटल नोएडा के डॉक्टर्स ने आज जागरुकता सत्र आयोजित किया। इस जागरुकता सत्र में फोर्टिस हॉस्पिटल नोएडा के डॉक्टर्स ने क्रोनिक किडनी रोग (सीकेडी) के कारण रीनल फेल्योर की घटनाओं में हुई बढोतरी को लेकर सपोर्ट ग्रुप के माध्यम से लोगों को जागरूक किया।

संकल्प – जीवन का उत्सव (ए सपोर्ट ग्रुप मीट) में 50 से अधिक ऐसे रोगियों की भागीदारी देखी गई, जो गुर्दे के प्रत्यारोपण और डायलिसिस रखरखाव से गुजर चुके हैं। मरीजों ने गुर्दे की बीमारी के खिलाफ अपनी स्वास्थ्य लाभ यात्रा को साझा किया।

इस अवसर पर डॉ अनुजा पोरवाल- अतिरिक्त निदेशक, नेफ्रोलॉजी, डॉ। दुष्यंत नादर- निदेशक, यूरोलॉजी, श्री मोहित सिंह- जोनल निदेशक, फोर्टिस हॉस्पिटल्स लिमिटेड और डॉ शानू शर्मा- चिकित्सा अधीक्षक, फोर्टिस अस्पताल, नोएडा सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

डॉक्टरों ने किडनी के स्वास्थ्य के महत्व और सीकेडी के रोगियों के जीवन की बेहतर गुणवत्ता को सक्षम करने के क्षेत्र में हाल ही में की गई प्रगति पर जोर दिया। क्रोनिक किडनी डिजीज के तेजी से बढ़ते मामलों के पीछे कई कारण हैं। इनमें शराब का नियमित सेवन, दवाओं का दुरुपयोग, गंभीर डिहाइड्रेशन, असंतुलित आहार और दर्द निवारक दवाओं का अनियंत्रित उपयोग आदि क्रॉनिक किडनी डिजीज के मरीजों की बढ़ती तादाद के पीछे प्रमुख कारक हैं।

फोर्टिस हॉस्पिटल्स लिमिटेड के जोनल निदेशक श्री मोहित सिंह ने कहा “क्रॉनिक किडनी डिजीज से पीड़ित मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और पिछले एक दशक में लगभग दोगुनी हो गई है। मरीज जब एक बार रीनल डिजीज के आखिरी चरण में पहुंच जाता है, तब मरीज को जीवन भर डायलिसिस की जरूरत होती है या फिर किडनी ट्रांसप्लांट कराना होता है। भारत में किडनी की बीमारी का बोझ बढ़ाने वाले मुख्य रिस्क फैक्टर्स में डायबिटीज और हाइपरटेंशन भी शामिल हैं। अकेले डायबिटीज और हाइपरटेंशन ही सीकेडी के 60 फीसदी से अधिक मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। इस तरह की डरा देने वाली वृद्धि के साथ इन मामलों के और बढ़ने के आसार हैं।

फोर्टिस अस्पताल, नोएडा के चिकित्सा अधीक्षक डॉ शानू शर्मा ने कहा “इस बीमारी को लेकर जागरुकता का अभाव लगातार बढ़ते मरीजों की संख्या और मृत्यु दर के प्रमुख फैक्टर्स में से एक है जिसकी वजह से ये भारत में सबसे कम रिपोर्ट की गई, सबसे कम पहचान की गई बीमारी बनी हुई है। जनता को इस संबंध में जागरूक किया जाना चाहिए कि समय पर पहचान, नेफ्रोलॉजी के क्षेत्र में एडवांस्ड ट्रीटमेंट मॉड्यूल्स के जरिए इस बीमारी की तेज रफ्तार और मृत्यु दर पर अंकुश लगाया जा सकता है।

क्रोनिक किडनी फेल्योर के करीब दो लाख से अधिक मरीज किडनी मिलने का इंतजार कर रहे हैं जबकि सालाना बमुश्किल 5000 किडनी ट्रांसप्लांट होते हैं। रीनल ट्रांसप्लांट की इस भारी मांग के पीछे एडवांसमेंट्स को लेकर जागरुकता की कमी और किडनी दान करने को लेकर लोगों में अपने स्वास्थ्य को लेकर भ्रम प्रमुख वजह हैं।

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