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एआई का बढ़ता असर: जब मशीनें करने लगीं इंसानों का काम, तो क्यों घटने लगीं नौकरियां?
कभी कंप्यूटर को इंसान का सबसे बड़ा मददगार माना जाता था, लेकिन अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आने से एक नया सवाल खड़ा हो गया है।
- sakshi choudhary
- 23 Oct, 2026
कभी कंप्यूटर को इंसान का सबसे बड़ा मददगार माना जाता था, लेकिन अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आने से एक नया सवाल खड़ा हो गया है। क्या यही तकनीक लोगों की नौकरियों के लिए चुनौती बन रही है? भारत की छह बड़ी आईटी कंपनियों में एक साल के भीतर कर्मचारियों की संख्या में 24,422 की कमी और ब्रिटिश बैंक बार्कलेज की 5,000 नौकरियां घटाने की योजना ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है।
जब एक मशीन करने लगे कई लोगों का काम
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए। मान लीजिए, एक कंपनी में दस लोग कंप्यूटर पर बैठकर अलग-अलग काम करते हैं। कोई सॉफ्टवेयर में गलती ढूंढता है, कोई रिपोर्ट बनाता है और कोई ग्राहकों की समस्याओं का जवाब देता है। अब कंपनी के पास ऐसा एआई टूल आ जाता है, जो इन कामों में से कुछ काम बहुत कम समय में कर सकता है। ऐसे में कंपनी को हर काम के लिए पहले जितने लोगों की जरूरत थी, उतने लोगों की जरूरत शायद न पड़े। यही बदलाव आज आईटी की दुनिया में देखने को मिल रहा है।
अमर उजाला की 23 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की छह प्रमुख आईटी कंपनियों में टीसीएस, इन्फोसिस, एचसीएल टेक, विप्रो, टेक महिंद्रा और एलटीआई माइंडट्री शामिल हैं। इन कंपनियों में अक्टूबर 2025 में कुल 8,22,144 कर्मचारी थे, जो अक्टूबर 2026 में घटकर 7,97,722 रह गए। यानी एक साल में कर्मचारियों की कुल संख्या करीब तीन प्रतिशत कम हो गई।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इन सभी कर्मचारियों को एआई के कारण नौकरी से निकाला गया। रिपोर्ट के अनुसार, पुरानी नौकरियां छोड़ने वालों की संख्या नई भर्तियों से अधिक रही। एआई के साथ-साथ कंपनियों का खर्च कम करने और काम करने के तरीकों में बदलाव भी इसकी वजह हैं।
बार्कलेज का फैसला क्यों बना चर्चा का विषय?
इस बदलाव की एक बड़ी मिसाल बार्कलेज बैंक है। रिपोर्ट के अनुसार, बैंक दुनिया भर में लगभग 5,000 नौकरियां कम करने की योजना बना रहा है। इसका उद्देश्य खर्च घटाना और तकनीक की मदद से काम को अधिक तेज बनाना है। बैंक में सपोर्ट, बैक-ऑफिस और डेवलपर जैसे काम करने वाले कर्मचारियों पर इसका असर पड़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस कदम से बैंक को हर साल करीब 1.3 अरब डॉलर की बचत होने का अनुमान है।
इसका भारत से भी संबंध है, क्योंकि बार्कलेज के महत्वपूर्ण कामकाजी केंद्रों में भारत शामिल है। जब कोई बड़ी कंपनी कम समय और कम खर्च में ज्यादा काम करने के लिए एआई का इस्तेमाल बढ़ाती है, तो कुछ पारंपरिक पदों की जरूरत घट सकती है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। एआई को बनाने, चलाने, उसकी गलतियां सुधारने और उससे जुड़े डेटा की सुरक्षा करने के लिए कुशल लोगों की जरूरत भी होती है।
क्या अब इंसानों की जगह मशीनें ले लेंगी?
इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है। एआई कुछ कामों को अपने आप कर सकता है, लेकिन हर काम में इंसान की जगह लेना उसके लिए संभव नहीं है। उदाहरण के लिए, मशीन किसी रिपोर्ट में गलती ढूंढ सकती है, लेकिन किसी कठिन समस्या को समझना, सही फैसला लेना, नई सोच विकसित करना और लोगों की भावनाओं को समझना अब भी बेहद महत्वपूर्ण है।
इसलिए असली चुनौती केवल नौकरियों का कम होना नहीं, बल्कि काम करने के तरीके का बदलना है। जो कर्मचारी नई तकनीक सीखेंगे और एआई के साथ काम करना जानेंगे, उनके लिए नए अवसर बन सकते हैं। वहीं, केवल पुराने तरीकों पर निर्भर रहने वालों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। आईटी कंपनियों के लिए भी जरूरी होगा कि वे कर्मचारियों को नई तकनीक का प्रशिक्षण दें और उन्हें बदलते काम के लिए तैयार करें।
युवाओं के लिए खतरा या नई शुरुआत?
आज स्कूल और कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि भविष्य में केवल डिग्री हासिल करना काफी नहीं होगा। नई चीजें सीखना, सवाल पूछना, समस्याओं का समाधान निकालना और तकनीक का सही इस्तेमाल करना भी जरूरी होगा। एआई का इस्तेमाल करके पढ़ाई, रिसर्च और नए विचारों पर काम किया जा सकता है, लेकिन उसकी दी गई हर जानकारी को सही मान लेना भी समझदारी नहीं है।
आखिर में सवाल एआई बनाम इंसान का नहीं, बल्कि एआई के साथ इंसान की तैयारी का है। मशीनें काम को तेज बना सकती हैं, लेकिन यह तय करना कि तकनीक का इस्तेमाल कैसे और किस उद्देश्य से होना चाहिए, इंसानों की जिम्मेदारी है। आने वाले समय में वही कंपनियां और कर्मचारी बेहतर स्थिति में होंगे, जो तकनीक अपनाने के साथ-साथ इंसानी कौशल को भी महत्व देंगे।