Monday, 12 May 2026 | 04:35 PM
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शहर छोड़ गांवों में बदलाव की नई कहानी लिख रहीं बेटियां, शिक्षा और रोजगार से बदल रहा ग्रामीण भारत

देश की कई युवा महिलाएं आज शहरों की चकाचौंध और सुविधाओं को छोड़कर ग्रामीण भारत में बदलाव की नई इबारत लिख रही हैं। ये बेटियां पिछले एक साल से अधिक समय से अलग-अलग राज्यों के दूरदराज गांवों में रहकर शिक्षा, आजीविका और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से विकास की मजबूत नींव तैयार कर रही हैं। इनका मानना है कि असली प्रगति तभी संभव है जब गांव आत्मनिर्भर और सशक्त बनें। यही सोच इन्हें कठिन परिस्थितियों के बीच भी ग्रामीण समाज में काम करने के लिए प्रेरित कर रही है।
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देश की कई युवा महिलाएं आज शहरों की चकाचौंध और सुविधाओं को छोड़कर ग्रामीण भारत में बदलाव की नई इबारत लिख रही हैं। ये बेटियां पिछले एक साल से अधिक समय से अलग-अलग राज्यों के दूरदराज गांवों में रहकर शिक्षा, आजीविका और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से विकास की मजबूत नींव तैयार कर रही हैं। इनका मानना है कि असली प्रगति तभी संभव है जब गांव आत्मनिर्भर और सशक्त बनें। यही सोच इन्हें कठिन परिस्थितियों के बीच भी ग्रामीण समाज में काम करने के लिए प्रेरित कर रही है।


तमिलनाडु में पिंकी वर्मा पारंपरिक पाम फ्रॉन्ड कला को पुनर्जीवित कर महिलाओं को रोजगार से जोड़ रही हैं, वहीं राजस्थान में संजना यादव लैंगिक समानता और शिक्षा के जरिए बच्चों में नई सोच विकसित कर रही हैं। पश्चिम बंगाल की परार्धा गोयल महिला बुनकरों की आर्थिक स्थिति सुधारने में जुटी हैं, जबकि ओडिशा की साक्षी जैमिनी मशरूम उत्पादन के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हैं। इन सभी प्रयासों ने गांवों में महिलाओं के लिए नए अवसरों के द्वार खोल दिए हैं।


इसी क्रम में केरल की वंशिका यादव जनजातीय महिलाओं को कौशल और रोजगार से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बना रही हैं। इन युवा महिलाओं की पहल से न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, बल्कि सामाजिक बदलाव की एक नई लहर भी पैदा हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी पहलें ग्रामीण भारत के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकती हैं, जहां शिक्षा और कौशल ही वास्तविक सशक्तिकरण की कुंजी बन रहे हैं।