घर तो बड़े हो गए, लेकिन आँगन और संवाद छोटे हो गए
- Kapil Choudhary
- 03 Sep, 2026
लेखक - विकास तोंगड़
अपनों के बीच संवाद से दूरी : युवा परिवेश में,
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि हम 21वीं सदी की इस दुनियादारी के बीच जी रहे हैं। क्या हमारे पूर्वजों ने अपने समय के हिसाब से जीवन नहीं जिया? बिल्कुल जिया! लेकिन हम भूल रहे हैं कि उस समय के जीवन और आज के जीवन के बीच हमने एक सामाजिक परिवेश में बहुत लंबी लकीर खींच दी है। यही लकीर आज हमारी युवा पीढ़ी को सही रास्ते से भटका चुकी है।
रास्ते से भटकने का यह सिलसिला ऐसा नहीं है कि इसमें सिर्फ एक-दो वर्ष लगे हों—ऐसा बिल्कुल नहीं है। मेरे अनुभव के मुताबिक, इसमें कम से कम 15 से 20 वर्ष लगे हैं, हालाँकि यह आँकड़ा थोड़ा ऊपर-नीचे भी हो सकता है।
गांव के पुराने घर और साझा आँगन
आप अपने उन बुजुर्गों को याद कीजिए, जो गाँवों के भीतर एक बेहद सरल और व्यवस्थित जीवन जिया करते थे। वे मकानों को इस प्रकार बनाते थे, जिसमें रहन-सहन की हर उचित व्यवस्था होती थी। उस समय मकान बनाते वक्त इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि पूरे परिवार का एक ही आँगन (बगड़) हो, ताकि किसी भी समय—चाहे सुबह हो या शाम—घर का मुखिया या बुजुर्ग परिवार के सभी सदस्यों से उनके दैनिक जीवन के बारे में संवाद कर सके।
इसी वजह से उस दौर में घर के किसी हिस्से में सामाजिक स्तर पर एक ‘बैठक’ बनाई जाती थी, जो हर संयुक्त परिवार के परिवेश के लिए बेहद जरूरी होती थी।
आजादी के समय परिवार और साक्षरता
आजादी के समय और वर्ष 1951 की पहली आधिकारिक जनगणना के दौरान भारत में एक औसत परिवार में लगभग 4.9 से 5 सदस्य होते थे। उस दौर में संयुक्त परिवारों का चलन बहुत ज्यादा था, जिसके कारण कई घरों में सदस्यों की संख्या इससे कहीं अधिक होती थी।
इसके बाद, 21वीं सदी के प्रारम्भ में पारिवारिक ढाँचे और सामाजिक मूल्यों में एक बड़ा बदलाव आया। अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो आजादी के समय भारत में साक्षरता दर बहुत कम थी। वर्ष 1951 के आधिकारिक आँकड़े उस समय की साक्षरता और पारिवारिक स्थिति को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं:
कुल साक्षरता दर: लगभग 12%
पुरुष साक्षरता दर: आँकड़ा दिखाता है कि उस दौर में शिक्षा के क्षेत्र में कितनी भारी कमी थी।
शहरीकरण और बदलता सामाजिक परिवेश : 21वीं सदी में सामाजिक परिवेश की शुरुआत इस बदलाव के साथ होती है कि इससे पहले भारत के परिवेश में शहरीकरण का विस्तार बहुत ही कम था। यदि हम आजादी के दौर में शहरीकरण के प्रमुख आँकड़ों पर नज़र डालें, तो स्थिति कुछ इस प्रकार थी:
शहरी आबादी का हिस्सा: वर्ष 1941 में शहरी आबादी मात्र 13.86% थी, जो 1947 की आजादी के बाद वर्ष 1951 की पहली जनगणना में बढ़कर 17.29% हो गई।
संख्या के आधार पर शहरी जनसंख्या: वर्ष 1951 में भारत की कुल 36.1 करोड़ की आबादी में से केवल 6.2 करोड़ लोग ही शहरों में रहते थे, जबकि शेष आबादी गाँवों में बसती थी।
विभाजन का प्रभाव (1947): आजादी के समय देश के विभाजन के कारण पाकिस्तान से आए लाखों विस्थापितों (शरणार्थियों) का एक बहुत बड़ा हिस्सा दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरी केंद्रों में आकर बसा। इसी वजह से 1941-1951 के दशक में शहरी आबादी की विकास दर में 41.4% का भारी उछाल देखा गया।
आजादी के समय के प्रमुख शहर और नए प्रयास :फिर इतिहास में कुछ ऐसा बदलाव आया, जिसने देश की दिशा बदल दी।
औपनिवेशिक बंदरगाह शहर: आजादी के वक्त भारत के मुख्य शहरी केंद्र वही थे, जिन्हें अंग्रेजों ने अपने व्यापार और प्रशासन के लिए विकसित किया था, जैसे—कलकत्ता (कोलकाता), बॉम्बे (मुंबई) और मद्रास (चेन्नई)।
नए नियोजित शहर: स्वतंत्रता मिलने के ठीक बाद, देश को आधुनिक रूप देने के लिए नए और योजनाबद्ध शहरों के निर्माण की शुरुआत हुई। इसी कड़ी में सबसे पहले चंडीगढ़, भुवनेश्वर और बाद में गांधीनगर जैसे आधुनिक शहरों की नींव रखी गई।
परिवेश और संस्कृति का बिखराव
इस विकास के साथ ही हमारे परिवेश की भौगोलिक स्थिति कुछ इस तरह बदली कि सामाजिक ताना-बाना हमारे हाथों से छूटने लगा। जिसे हम अपनी सांस्कृतिक विरासत कहते हैं, यानी हमारे घर के मुखिया और बुजुर्ग—उनका नियंत्रण और प्रभाव धीरे-धीरे कम होता चला गया।
बदलते दौर के साथ देश का सामाजिक परिवेश, राजनीतिक व धार्मिक परिस्थितियों के अनुरूप बदलने लगा और हमारी पुरानी व्यवस्थाएँ भी पीछे छूटती गईं।
देश के भीतर शहरीकरण में ऐतिहासिक बदलाव : तब से अब तक
स्वतंत्रता के बाद औद्योगिकीकरण और आर्थिक सुधारों के कारण शहरों का विस्तार बहुत तेजी से हुआ, जिसने हमारे सामाजिक परिवेश को पूरी तरह बदल कर रख दिया।
गाँव जहाँ सामुदायिक जीवन, आपसी तालमेल और परंपराओं से बंधे होते हैं, वहीं शहरों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आधुनिकता को बढ़ावा दिया। इसी आधुनिकता की अंधी दौड़ ने परिवारों के आपसी संबंधों में दूरियाँ पैदा कर दीं।
पारिवारिक ढाँचे में बदलाव : संयुक्त से एकल परिवार
गाँवों का पारंपरिक संयुक्त परिवार का ढाँचा शहरों में आकर सिमट गया और एकल परिवार में बदल गया। शहरों में मकानों की कमी, अत्यधिक महँगाई और संकुचित सोच के कारण लोग अब सिर्फ अपने जीवनसाथी और बच्चों के साथ ही रहना पसंद करते हैं।
वरिष्ठ नागरिकों का अकेलापन और युवा पीढ़ी का भटकाव
एकल परिवारों के इस बढ़ते चलन के कारण घर के बुजुर्ग अक्सर गाँवों में ही अकेले छूट जाते हैं। इससे बुजुर्गों की उचित देखभाल और उनके सामाजिक जुड़ाव में भारी कमी आई है।
विडंबना यह है कि परिवार के कुछ सदस्यों को यह बिखराव सामाजिक बंधनों से अपनी ‘आजादी’ जैसा लगा—वे इसे एक खूबसूरत सपना समझने लगे।
नतीजतन, आज का युवा अपने सामाजिक परिवेश के मूल ढाँचे और संस्कारों से पूरी तरह वंचित होता चला गया। इसमें उस युवा का कोई मूल दोष नहीं है, क्योंकि उसे वह परिवेश मिला ही नहीं।
गाँव की मिट्टी और माँ की ममता से दूरी
धीरे-धीरे स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि आज का युवा गाँव की मिट्टी और माँ की ममता की छाँव से भी वंचित होने लगा है। वह समय अब इतिहास बन चुका है, जब कोई भी माँ का जाया बेटा अपनी माँ के मान-सम्मान और उसकी एक आवाज पर अपने प्राण तक न्योछावर करने को तैयार रहता था।
आज के बदलते परिवेश ने उस गहरे भावनात्मक जुड़ाव को बहुत कमजोर कर दिया है।
चंदन का आत्मबलिदान : पन्नाधाय का बेटा
यह इतिहास का सबसे महान और अनुपम उदाहरण माना जाता है, जहाँ एक बालक ने अपनी माँ के कर्तव्य और वचनों की लाज रखने के लिए हँसते-हँसते अपनी जान दे दी।
प्रसंग: चित्तौड़गढ़ के दुष्ट बनवीर से महाराणा सांगा के छोटे पुत्र, राजकुमार उदयसिंह के प्राणों की रक्षा करने के लिए पन्नाधाय ने अपने सगे बेटे चंदन को राजकुमार के बिस्तर पर सुला दिया था।
बलिदान: चंदन अपनी माँ के इस फैसले और स्वामिभक्ति के गौरव को पूरी तरह समझता था। जब बनवीर हाथ में नंगी तलवार लेकर कक्ष में आया, तो चंदन ने अपनी माँ की ममता और उसके त्याग की लाज रखने के लिए एक चीख तक नहीं निकाली। उसने चुपचाप तलवार का वार सहा और अपने प्राणों की आहुति दे दी।
आज के परिवेश की विपरीत स्थिति
जबकि आज के बदलते परिवेश में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत हो चुकी है। आज आधुनिकता की अंधी दौड़ में कई युवा किसी भी रिश्ते की मर्यादा का ध्यान नहीं रख रहे हैं।
हालाँकि, यह बात देश के सभी बेटों पर लागू नहीं होती। आज भी बहुत से ऐसे युवा हैं, जो अपने माता-पिता के सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने जीवन के सुखों, यहाँ तक कि अपने करियर या सपनों तक का हँसते-हँसते त्याग कर देते हैं।
युवाओं का परम कर्तव्य
फिर भी, आज की युवा पीढ़ी को हमेशा यह फर्ज याद रखना चाहिए कि आपको इस खूबसूरत दुनिया में लाने वाली और कोई नहीं, बल्कि एक माँ ही है। उसने असहनीय पीड़ा सहकर आपको इस संसार में जन्म दिया है और पाल-पोसकर बड़ा किया है। इसलिए उसकी ममता और सम्मान की रक्षा करना हर संतान का पहला और सबसे बड़ा कर्तव्य है।
इसीलिए, हर बेटे की पहली प्राथमिकता अपनी माँ के प्रति उसका कर्तव्य होना चाहिए। उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके किसी भी कृत्य के कारण उसकी माँ को इस सामाजिक परिवेश में कभी भी अपमान या लज्जा का जीवन न जीना पड़े।
आज एक माँ न जाने कितने संघर्षों और अभावों के बीच आपको पाल-पोसकर बड़ा करती है। वह जीवनभर बस एक अच्छे वक्त का इंतज़ार करती है कि जब उसका बेटा बड़ा और सक्षम होगा, तब वह अपने उन सुनहरे सपनों को पूरा करेगी, जो उसने बरसों से अपने मन में आपके लिए संजो रखे हैं।
एक माँ का बेटा, दूसरी माँ की कोख उजाड़ रहा है
लेकिन आज इस बदलते सामाजिक युवा परिवेश में क्या चल रहा है?
एक माँ का बेटा, दूसरी माँ की कोख उजाड़ रहा है!
वह भूल जाता है कि जिसका घर या जीवन वह तबाह कर रहा है, वह भी उसी की तरह किसी माँ का जाया बेटा है।
यह सब सिर्फ और सिर्फ उन भौतिक और नश्वर वस्तुओं—पैसा, ज़मीन, अहंकार—की अंधी दौड़ के कारण हो रहा है, जिनका इस दुनिया से जाने के बाद हमारे अस्तित्व में कोई महत्व ही नहीं रह जाता।
किसी की बेटी और किसी की बहन
यही हृदयविदारक स्थिति तब भी पैदा होती है, जब हमारे ही समाज के बीच किसी बाप की बेटी और किसी की बहन को लोग बड़े चाव और लाड-प्यार से पालते हैं।
माता-पिता अपनी लाडली की शादी इस अटूट विश्वास के साथ करते हैं कि उन्होंने अपनी बेटी के लिए जो वर चुना है, वह एक बहुत ही सरल, सुसंस्कृत और अच्छे स्वभाव का युवा है।
लेकिन जब वही युवा बाद में बदल जाता है, तो एक हँसता-खेलता परिवार तबाह हो जाता है।
मगर बाद में हम देखते हैं कि वही युवा अपनी राह बदलकर गलत रास्तों पर निकल पड़ता है। उसे तनिक भी इस बात का आभास नहीं रहता कि उसके पीछे उस लड़की के बेबस माता-पिता, भाई और पूरा परिवार है जिन्होंने उसकी सरलता, अच्छे स्वभाव और आदर्श छवि पर भरोसा करके उसे अपनी बेटी के सुहाग के रूप में चुना था।
भटका हुआ युवा और झूठी शान
मगर आज का भटका हुआ युवा तो अपनी ही धुन में सवार है, उसकी जवानी का अहंकार आसमान छू रहा है। उसे इन पारिवारिक भावनाओं या मर्यादाओं से क्या लेना-देना?
वह सोचता है, “मैं अपनी जगह बिल्कुल ठीक हूँ, मुझे तो दोस्तों की टोली के बीच रहकर एक रईस और शान-शौकत वाली जिंदगी जीनी है। अब मैं बड़ा हो गया हूँ और मुझे सब मालूम है कि कौन अपना है और कौन पराया।”
वह पूरी तरह भूल जाता है कि वह एक माँ का बेटा होने के साथ-साथ किसी की माँग का सुहाग भी है। उसे तो बस अपनी इस भोग-विलास और दिखावे की जिंदगी में आनंद आता है।
वह यह शाश्वत सत्य भूल जाता है कि गलत रास्ता कभी लंबा नहीं चलता और अंत में वह अपने जीवन को भी तबाही से नहीं बचा पाता।
वह खुद को तो बर्बाद करता ही है, साथ ही उस सुहागन औरत—जो किसी की लाडली बेटी है—और उस बूढ़ी माँ—जिसने उसे अपनी ममता से सींचा था—की जिंदगी भी जीते-जी नर्क बना देता है।
अंत में ऐसी दर्दनाक खबरें सामने आती हैं कि किसी करीबी युवा ने अपनी झूठी शान, दौलत या बेबुनियाद इज्जत को बचाने के चक्कर में किसी मासूम की हत्या कर दी या खुद का जीवन समाप्त कर लिया।
साथियों, अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि आज हम तरक्की की अंधी दौड़ में जितने आगे निकल चुके हैं, अपनों से उतने ही दूर होते जा रहे हैं।
शहरों में बड़ी-बड़ी इमारतें और आलीशान फ्लैट्स तो बन गए, लेकिन उनके भीतर से वह पुराना साझा आँगन और अपनों की वह आत्मीय ‘बैठक’ गायब हो गई।
युवा पीढ़ी का यह वैचारिक और नैतिक भटकाव सिर्फ उनकी निजी गलती नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक व्यवस्था का दुष्परिणाम है, जिसे हमने आधुनिकता के नाम पर आँख मूँदकर अपनाया है।
यदि हमें अपनी युवा पीढ़ी को अवसाद, अकेलेपन, अपराध और भटकाव के इस दलदल से बचाना है, तो हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना ही होगा।
हमें अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कम से कम एक पहर ऐसा निकालना ही होगा, जहाँ पूरा परिवार बिना मोबाइल फोन या किसी तकनीकी व्यवधान के एक साथ बैठे और आपस में खुलकर संवाद करे।
याद रखिए, कंक्रीट के मकान सिर्फ दीवारें खड़ी करते हैं, लेकिन एक सुखी, सुरक्षित और संस्कारित समाज का निर्माण केवल अपनों के साथ और बुजुर्गों के आशीर्वाद से ही संभव है।
आइए, इस आधुनिक दुनिया में रहते हुए भी अपने संस्कारों, नैतिक मूल्यों और संयुक्त परिवार की उस खूबसूरत परंपरा को जीवित रखने का दृढ़ संकल्प लें।
धन्यवाद